Mirza Ghalib remains the most quoted name in Urdu poetry, and this collection brings together his genuine, verified shayari — straight from his actual ghazals — translated into simple Hindi Devanagari so every reader can enjoy the depth of his words.
From heartbreak and longing to philosophy and wit, these two-line shers capture emotions that still feel fresh nearly two centuries later. Below you’ll find Ghalib’s poetry organized by mood and theme, ready to read, share, or post.
Mirza Ghalib Shayari

1
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता
2
हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानूँ पे धरा होता
3
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है
4
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे
5
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
6
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
7
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
Mirza Ghalib Shayari Love
1
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
2
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता
3
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
4
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
5
हुए मर के हम जो रुस्वा, हुए क्यों न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता
6
यह मसाइल-ए-तसव्वुफ़, यह तेरा बयान ‘ग़ालिब’
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता
7
वो जो हम में तुम में क़रार था
तुम्हें याद हो कि न याद हो
Mirza Ghalib Famous shayari
1
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
2
डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
3
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले
4
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
5
ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले
6
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी हिंदी में
1
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
2
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
3
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है
4
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है
5
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है
6
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं
7
बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
Mirza Ghalib Ki Shayari

1
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
2
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
3
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
4
जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीअत इधर नहीं आती
5
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बां कोई न हो
6
बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
कोई हम-साया न हो और पासबां कोई न हो
7
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहाख्वां कोई न हो
Mirza Ghalib Shayari in Hindi
1
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
2
दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सद-कामे-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
3
इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही
4
कट ही जीजे न ताल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही
5
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को एक अदा में रज़ामंद कर गई
6
मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को
वो वलवले कहाँ, वो जवानी किधर गई
7
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया, पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2 Lines
1
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने
2
मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने
3
रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे
ने हाथ बाग पर है न पा है रकाब में
4
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
वो शिकवे और वो सवाल कहाँ
5
या रब ज़माना मुझको मिटाता है किस लिए
लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं
6
हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनहगार हूँ काफ़िर नहीं हूँ मैं
7
‘ग़ालिब’ वज़ीफ़ाख़्वार हो, दो शाह को दुआ
वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं
Zindagi Mirza Ghalib Shayari in Hindi

1
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री ‘ग़ालिब’
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे
2
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
3
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नहीं आती
4
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
5
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ
6
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
7
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
Mirza Ghalib Shayari Mohabbat
1
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों
रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों
2
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
3
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
4
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयां और
5
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
Conclusion
Ghalib’s shayari has survived nearly 200 years because it speaks to something timeless — love, loss, faith, and the quiet chaos of being human. Save your favourite couplets from this list and share them with anyone who needs a few honest words today.

Aman Mishra is the writer behind PoetryDrift, where he shares heartfelt poetry and deep emotions through simple, meaningful words. His work reflects love, life, and inspiration for every reader.

